एक कलाम और लिखो, शब्द चुराने है
एक तान और छेड़ो, चुनने तराने है
चुप ना बैठा करो बस
तुम बस सपने देखो, मैने वो अपने बनाने है
तुम्हारे कलाम और मेरे ख्याल, एक जैसे है
तुम्हारी सोच और मेरी बात, एक जैसे है
हाय हैलो क्या हाल और इधर उधर की कोई बात, और उनके पीछे जज्बात, एक जैसे है
अकस्मात टकराना यूहीं कहीं, फिर छेड़नी कोई भी बात, वो गुफ्तगू की बिसात एक जैसे है
एक कलाम अधूरा है, पूरा करोगे क्या?
एक आईने का अक्स गुम है, ढूंढने चलोगे क्या?
खूब कलमें रटे है खुदा से मिलने को, वो मशगूल है... तुम मिलोगे क्या?
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