वक्त वक्त की बात है
निकम्मे दोस्त व्यस्त आज है
कोई उन्हें बताओ
मयखाना नाराज है
सलाद, पापड़ और मूंगफली ढूंढ रही है उन्हे
उछल के निकलने वाली बीयर उदास है
30:60 का पैमाना भी सुख गया है
उसे भी तुम्हारी प्यास है
निकम्मों आज तुम्हारा मयखाना नाराज है
वो चेहरे पर उड़ती, आती जाती सी रंगत
वो हांकना, वो डींगे, वो भाई की गाड़ी की चाहत
वो हंसना, खिलखिलाना वो फोकी बादशाहत
वो टेबल कुर्सी अधूरी लगती आज है
मना लो इसका बिफरता मिजाज़ है
कोई उन्हें बताओ मयखाना नाराज है
Leave a comment