
मैं रहा बड़ी इमारत में
होटल पांच सितारा में
हसीन चेहरे मुस्कुराते चारो ओर थे
शराब व्यंजन परोसते लोग थे
बिस्तर मुलायम था
वातानुकूलित कमरा रहने लायक था
सत्कार में कमी न थी
पर नींद पास खड़ी न थी
करवटे बदलते रहे
धड़ियां गिनते रहे
आराम तो दिखता था पर सुकून नहीं मिलता था
वो तो मां के साथ में था
पत्नी की बात में था
कड़वे मीठे झगड़ो में था
भागते हुए हुए पल में था
लेट बनते नाश्ते में था
छोटी होती रातों में था
रात भर उठने की आदत में था
सिकुड़ते हुए शयन में था
बड़ी होती छोटी जिद्द में था
शरारती की चहचहाट में था
धूप से तपते आंगन में था
वो तो दो कमरों के जहान में था
सुकून तो सिर्फ अपने मकान में था
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