आज फिर खुद की याद आई
आज फिर ढूंढ ना पाया
आज फिर पायी भीड़ खुद में
आज फिर अकेला था साया
बस इश्क इतना सा होने से रह गया
मैं उसकी आंखो में गुम होने से रह गया
बार बार मिल जाता था वो नसीब की तरह
बस हाथ की लकीर्रो में लिखने से रहा गया
बड़ी मासूमियत से उसने राह बदलने को पूछा
हमेशा की तरह में हां करके रह गया
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