मन एकाकी करता छलावे
चाहे सब कुछ, कुछ न पावे
अनजान पथ कैसे पथिक पहचाने
मन में मंजिल, कैसे समझावे
मृगतृष्णा सी भूख सजन की
पास नहीं फिर भी दिख जावे
मन एकाकी करता छलावे
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Deeper you go, Lighter you feel!
मन एकाकी करता छलावे
चाहे सब कुछ, कुछ न पावे
अनजान पथ कैसे पथिक पहचाने
मन में मंजिल, कैसे समझावे
मृगतृष्णा सी भूख सजन की
पास नहीं फिर भी दिख जावे
मन एकाकी करता छलावे
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